बेटी होना अभिशाप ?
जीवन का वृतांत करना असंभव सा है !
उदेश्य क्या है? वो न मुझे मालुम है न क़िसी और को,जंहा तक मुझे मालुम है,लोग फालतु का ज्ञान बाट कर खुद को परमयोगी सिध्द करनें मे लगें हुए है मांजरा था कल का,तेज चिलचिलाती धुप,चहरे पर पसीनें की बुँदे,मैं अपने कार्य के सिलसिले मे मुझे जैसलमेर जाना था, महीनें मे दो बार जाना होता था,रास्ते मे राजस्थान के लोक देवता बाबा राम देव जी की समाधि पडती थी तो सोचा दर्शंन करके ही आगे निकल लु , थोडा काम भी था ! बस से पोकरण उतर कर चार पहिया वाहन से मे राम देव जी की समाधि पर पहुचां , गर्मी के चलते सर्ट पसीने से तर बतर हो रहा था ,जल्दी से वापस मुझे जैसलमेर के लिए मुझे गाडी पकडनी थी , मंदिर से बाहर कुछ ही दुरी पर एक गाड़ी लगी हुई थी जिप्सी उसमे बीच वाले भाग मे बैठ गया जो ड्राईवर एक पीछे थी कुछ ही देर मे मेरे बगल मे एक लडकी आकर बैठी जिसके हाथ मे एक नन्ही संतान थी ,साथ मे उस लडकी की मां भी थी मललब नन्हें शिशु की नानी ! शायद संतान के जन्म के बाद अपनी माँ से विदा ले रहीं थीं इस धूप मे पसीनें की बुंदों से ज्यादा उस बेटि कि आँखों के आँसु थे, राजस्थान मे स्त्रीयां प्रसव के पश्चात कुछ दिनों अपने पीहर ही रहती है तो शायद आज उसके भी मायके जाने का वक्त था ! सब देख मेरा मन पसीज़ गया,बहन के विदाई के वक्त पास खडे भाई ,माँ ,छोटी बहन ,सब कि आँखों मे आँसु थे ! और उस बेटी के हाथ मे एक नवजात शिशु , जिसके गालो पर मामा, मांसी के हाँथ अविरल सहला रहे थे। ज्यों -ज्यों गाड़ी के निकलने का क्षण नज़दीक़ आता, माँ की पल्लू अपने आंसुओं को पोंछती ! चित्रण करना भी असम्भव सा हैं ! प्रत्यदर्शी भी भावुक थे ! क्या सच मे बेटी होना अभिशाप है ?
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