पहली मुलाकात

"जी क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ.." उसने पलटकर देखा और बिना कुछ कहे गर्दन खिड़की की ओर घुमा ली.. अनिल बैठ गया...अब लड़की की खामोशी का मतलब हाँ ही तो होता है... "खीरा ले लो...दो का तीन..खीरा..." "ओ खीरे वाले तीन खीरे दे दे भाई..बड़ी गर्मी है यार.." खिडकी से बाहर की ओर वो खीरे वाला खीरा बेच रहा था.. "मैडम थोड़ा ई खीरा बढ़ा दीजिए.." उसने खीरा रिसीव कर..अनिल को पकड़ा दिया... "ये पैसे भी जरा.." दस का नोट खीरे वाले को दिए..उसने छुट्टे वापस किये...उसकी आँखों से साफ़ झलक रहा था यूँ संदेशवाहक होना उसे पसंद नहीं आ रहा...फिर भी उसने छुट्टे अनिल को दिए.. "आप खीरे खाएंगी..?.." उसने देखा भी नहीं... "एक लीजिए.." "आप शांति के साथ नहीं बैठ सकते क्या..." इस दो टूक जवाब से उसने उसके मुँह पर ताला लगा दिया.. खीरा ख़त्म किया..अब वापस कागज़ फेंकने की बारी थी..इधर उधर देख रहा था..पर अनिल की हिम्मत नहीं थी की वो अंजली से कहे..पिछला जवाब उसे बखूबी याद था... अंजली ने उसकी ओर देखा..एक लंबी साँस ले अपना हाथ बढ़ा दिया..उसने एक स्माइल के साथ कागज हाथ पर रख दिया... "थैंक्स.." अंजली ने फिर उसकी तरफ नहीं देखा...एक घंटे का सफर हो चूका था अब.. "आप कहाँ जा रही है..?" "ये बस पटना जा रही है न..तो बस वही जा रही हूँ.." "कमाल है यार मतलब सीधा जवाब नहीं दे सकती..ये बस पटना जा रही है तो क्या..हाजीपुर से पटना के बीच कई जगह रूकती है..अब मुझे क्या मालूम आप पटना ही जा रही है.." "आपको क्या करना है..मैं कहीं भी जा रही हूँ.." "बस..यूँ ही..मैं एक जरुरी काम से जा रहा हूँ थोड़ा परेशान हूँ..आप बगल में बैठी है ..बस परेशानी कम करने को सोचा आप से बात कर लूँ पर आप तो.." "मैं भी किसी जरुरी काम से जा रही हूँ और आपकी ये बिना मतलब की बातें मुझे परेशान कर रही है..ठीक है..तो प्लीज आप मुझसे न ही बोलें..." कहकर अंजली ने वापस अपनी गर्दन खिड़की की ओर घुमा ली..अब अनिल भी बुरी तरह खीज चूका था... "देखा जो तुमको ...ये दिल को क्या हुआ है..मेरी धड़कनो पे ये छाया क्या नशा है...." अंजली ने फिर उसकी तरफ गुस्से में देखा...बाकी के अल्फ़ाज़ उसके गले में ही रह गए.. "मतलब आदमी गाना भी नहीं गा सकता.." अनिल धीरे से फुसफुसाया... अंजली ने बैग से इयरफोन निकाला...कान में डाला..और उसके तरफ इशारा किया..कि अब गा सकते हो... ड़ो घंटे बाद अचानक से अंजली की नींद खुली...उसने बाहर की ओर देखा.. "ये बस चल क्यों नहीं रही" "ये गाँधी सेतु है मैडम...जाम में इसका वर्ल्ड रिकॉर्ड है.." "ओह्ह शिट...ये फोन की बैटरी भी डाउन हो गयी.." अंजली ने उसके तरफ प्यार से देखा.."क्या मैं आपके फोन से एक कॉल कर सकती हूँ.." अनिल ने फोन बढ़ा दिया..अंजली ने नंबर डायल किया.. "मतलबी...हो जा ज़रा मतलबी..." अंजली ने फिर अनिल की तरफ देखा...फोन वापस पकड़ा दिया.. "क्या हुआ फोन लगा नहीं.." "एंगेज टोन आ रहा है..." अंजली परेशान थी..अब अनिल ने बाकी सफर में उसकी परेशानी कम की ..उसकी उन बेबाक सी बातों में सफर कब काट गया पता ही न चला... बस पटना पहुँच चुकी थी...अंजली ने फिर से फोन माँगा..नंबर डायल किया..फिर से एंगेज टोन... अंजली ने फोन वापस किया..और थैंक्स बोल जाने को मुड़ी...फोन की बैटरी निकाली उसको थोड़ा रगड़ा..बमुश्किल ऑन किया.. फोन बज उठा "हेल्लो हाँ कहाँ हो तुम.." "तुम्हारे पीछे.." वो पीछे पलटी...वो चौंक उठी..अनिल भी स्तब्ध खड़ा था... सात महीने से एक दूसरे से फोन पर बात करने के बाद आज वो मिलने वाले थे...बिन देखे ही प्यार कर लिया था दोनों ने.. जिस पहली मुलाकात को इतने बेसब्र थे वो दोनों उन्हें पता भी नहीं था..वो सात घंटे पहले ही हो चुकी थी....

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