Shobha

'शोभा !'
उसके कानों के पास कोमलता से अरुण उसका नाम पुकार रहा था. अरुण इसी कमरे में है उसे पता था , पर उसकी इस असहज निकटता से वह एकदम चौंक गयी और उसने मुड़ कर पीछे देखा. अरुण इधर- उधर देखने लगा, वह इंतजार करती रही कि वह जो भी कहने आया है कहे . पर जब वह अखबारों को इधर - उधर ,ऊपर - नीचे करने में लग गया तो उसने थकी सी आवाज में पूछा-
'क्या है अरुण, क्या कह रहे थे तुम ?'
इस बार अरुण ने शोभा की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा -
----'कुसुम वापस आ गयी है.'
----'क्या मजाक करते हो अरुण.'
-----'कसम से,मेरे साथ चल के देख लो विश्वास न हो तो.'
----' लेकिन ये कैसे हो सकता है?',उसने जैसे अपने से ही सवाल किया.
----' क्यों नहीं हो सकता ? कह रही है कि तुमसे बात करेगी.'
----'मुझसे,मुझसे क्या बात करेगी ? तुम हो,उसके दोस्त हैं..'
----' मगर शोभा,तुम उसकी मां हो . वह तुम्हीं से बात करना चाहे तो ?'
----'मैं कुछ नहीं जानती.'
----''ऐसी मूर्खता मत करो . ठंडे दिमाग से सोच लो फिर जाना और उससे बात कर लेना . वह इस बार बिल्कुल टूट गयी सी लगती है .उसे तुम्हारे सहारे की जरूरत है '.
शोभा की समझ में अभी तक नहीं आया था कि कुसुम एकाएक लौट कैसे आयी? सच तो यह है कि वह लगभग भूल ही चुकी थी कि उसकी कोई बेटी भी है . इस संबंध के इर्द- गिर्द इतनी काई सी जम गई थी कि उजला सा कुछ देख पाना संभव नहीं रह गया था . किसी की मां के रूप में उसने अपनी पहचान बिल्कुल ही खो दी थी और मां का अभिनय करने की उसकी कोई इच्छा न थी.
कुछ साल पहले जब कुसुम इस घर की दहलीज लांघ कर चली गयी थी,सारा मोहल्ला फुसफुसाया था लगातार कई दिनों तक . अब उसकी वापसी पर भी आदतन फुसफुसायेगा . इतने साल कहाँ थी ? आज मेरी क्या जरूरत पड़ी ? वह कुसुम से कई सवाल पूछना चाहती थी,लेकिन क्या वह पूछ सकेगी ?
बेडरूम से अचानक घड़ी का अलार्म सुनायी दिया . बेवक्त की अलार्म घड़ी की ट्रिन - ट्रिन शोभा को असहज कर जाती है. अनायास ही उसके कदम बेडरूम की ओर बढ़ गये . कमरे में घुसते ही वह ठगी सी रह गयी . कुसुम अरुण के बिस्तर पर लेटी हुई अलार्म घड़ी को छेड़े जा रही थी.
----'ओह मम्मी ! मुझे मालूम था कि आप जरूर इधर आयेंगी.'
----'उफ !'
इस लड़की को क्या हो गया है? ये वो कुसुम तो कदापि नहीं है जो आज से पांच साल पहले हुआ करती थी . कहाँ गई इसकी वह मासूम तरुणाई ? इस समय तो यह पूरी औरत मालूम होती है . वह छरहरी काया कहाँ लुप्त हो गई है? यह ओढ़ा हुआ बेपरवाही का बाना कहां से उड़ा कर लाई है?
-----'मम्मी, प्लीज़ इधर आओ . इस तरह घूर-घूर कर मत देखो . रीयली,आय एम इन ट्रबल . मेरी अच्छी मम्मी मेरी मदद करो.'
-----'क्या चाहती हो ?',शोभा न चाहते हुए भी कह बैठी . कुसुम को देखते ही उसके भीतर कुछ उमड़ने-घुमड़ने लगा था.
-----'जस्ट टैल मी मम्मी,हाऊ डज़ इट फ़ील टु हैव ए बेबी ?'
-----' क्या ? आर यू..?'
-----'ओह यस मम्मी!यू नो,इट हैप्पन्स समटाइम्स'.
शोभा की आंखों के सामने अंधेरा छा गया . सारी दुनिया घूमती सी लगी . यह मूर्ख लड़की क्या कह रही है ?अपने होश खो बैठी है शायद .
------' मम्मी मुझे तुम्हारी मदद चाहिए . तुम एक बार मां बन चुकी हो और तुम्हें मुझसे ज्यादा अनुभव है.'
----'खैर, तुमने माना तो मुझे तुमसे ज्यादा अनुभव है.'
----'मानना ही पड़ेगा , ऑफ्टर ऑल दिस इज़ माय फर्स्ट चांस.'
----'छि: अपनी मां से इस प्रकार कैसे बात कर पा रही हो .यह तुमने क्या कर डाला बेटी?अरुण जानेंगे तो क्या कहेंगे? मैं उनको कैसे कह पाऊँगी?'
----'डोन्ट वरी मम्मी !डैड पहले से ही जानते हैं.'
----'क्या अरुण जानते हैं?छि: तूने ही उन्हें बताया होगा . चलो मुझे नहीं कहना पड़ेगा . सुधीर कहाँ है? ये उसी की करतूत है ना ?'
----'सुधीर को क्यों दोष देती हो मम्मी,मैं ही पूरी सावधानी न रख सकी.'
----'सुधीर में ऐसा क्या है जो उसके पीछे पागल हो गयी है.? उसे अपने करियर की इतनी चिन्ता है कि वह तुझसे शादी नहीं कर सकता और तू है कि अपना अच्छा-खासा करियर बरबाद कर अपनी जिंदगी तबाह करने पर आमादा है.'
----'सच बताना मम्मी ,लड़कियों का भी कोई करियर है ? तुम दोष देती हो कि मैंने अपना करियर बरबाद कर अपनी जिंदगी तबाह कर ली है . मगर मैंने तो अक्सर लड़कियों को अपने करियर के पीछे परिवार,पति और बच्चों की जिंदगी तबाह करते देखा है. बताओ मैं सही हूँ या वो सब ?'
----'फिर भी बेटी तुम शादी तो कर ही सकती थीं.न हमारे पसंद के लड़के से तो सुधीर से ही सही.'
----'शादी की जरूरत ही क्या है ?शादी के बाद औरतों को रोटी,कपड़ा छोड़ कर और सुविधा है ही कहाँ? सुधीर शादी से पहले ही ये सब मुझे दे रहा है.'
----'चुप रह मूर्ख, क्या बके जा रही है! तुझे मालूम भी है कि तेरे बच्चे का क्या भविष्य है? तूने उसकी पैदाईश से पहले ही उसके लिये कितनी गहरी खाई खोद रखी है.'
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